शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

यमुनोत्री से गंगोत्री 4: यमुनोत्री

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
यमुनोत्री मन्दिर परिसर में पांचो

जहां जानकीचट्टी 2650 मीटर की ऊंचाई पर है वहीं यमुनोत्री मन्दिर 3235 की ऊंचाई पर स्थित है।इन दोनों के बीच की दूरी लगभग छः किलोमीटर है।यानी हमें 6 किलोमीटर में लगभग 600 मीटर की चढ़ाई करनी है।जो अपने आप में मुश्किल चढाई की श्रेणी में आती है।

हमने एक ढांबे पर चाय पी कर यात्रा की शुरुआत कर दी।शुरू शुरू में रास्ता ज्यादा मुश्किल नहीं है।इस रास्ते पर पत्थरों से सीढिया बनाई गई है जिन पर चढ़ने ने थकान जल्दी होती है।लेकिन रास्ता जितना मुश्किल है रास्ते की सुंदरता उतनी ही ज्यादा है।आसमान छूते पहाड़ों के बीच से जब गुजरते हैं तो लगता है कि इस संसार में अगर वास्तविक सुख है तो वो इन पहाड़ों में ही है।

चांदीराम सबसे ज्यादा उत्साह में लग रहा है।उसको लगता है कि अब वो समय आ गया है जब वो अपनी फिटनेस की ताकत सभी को दिखा सकता है।अगर शारीरिक बनावट के हिसाब से मूल्यांकन किया जाए तो हम पांचो में सबसे कमजोर और हल्का चांदीराम ही है।चांदीराम की इसी कमजोरी का हमेशा मजाक बनाया जाता है। आज चांदीराम का यही हल्कापन चांदीराम के अंदर जोश का संचार किये हुए है।वैसे चाँदीराम को सिर्फ एक ही आदमी से एलर्जी है और वो आदमी बदकिस्मती से मैं हूँ।चांदीराम का हर मुकाबला मुझ से ही होता है।

यात्रा के तीन किलोमीटर तो ठीक ठाक निकल गए।लेकिन जैसे जैसे आगे बढ़ रहे हैं।रास्ता वैसे ही मुश्किल होता जा रहा है।आधे रास्ते पर एक बार फिर से चाय पी गयी।अभी तक कि यात्रा का हिसाब किताब देखें तो अनिल और कालुराम सही हालत में है और सबसे आगे चल रहे हैं।बाकी चांदीराम, मैं और राजेंद्र एक साथ चल रहे हैं।कुल मिलाकर चांदीराम खुश है।उसके खुश होने का एक ही महत्वपूर्ण कारण होता है।वो है मेरा दुःखी होना।लेकिन वो सिर्फ इस एक कारण से खुश नही है।आनिल ने चांदीराम को बताया है कि हम यमुनोत्री के बाद गंगोत्री और उसके बाद केदारनाथ जाएंगे।जिससे चारधाम यात्रा के नियमों का पालन भी हो जाएगा चांदीराम को अनिल पर उतना ही यकीन है जितना यकीन महाभारत में युधिष्ठिर के सच बोलने पर गुरुद्रोणाचार्य को था।चांदीराम अनिल की हर बात को पत्थर की लकीर मानता है।
यमुनोत्री मार्ग पर एक लोहे का पुल

खड़े खड़े आराम करते हुए

रास्ते में खूबसूरत नजारा


लगभग 4 किलोमीटर चलने के बाद थकान बहुत ज्यादा होने लगी है।थोड़ी थोड़ी दूर चलने के बाद रुक कर आराम करना पड़ रहा है।हम लोग बैठकर आराम करने की बजाय खड़े खड़े थोड़ी देर सुस्ताते हैं और फिर चल पड़ते हैं।ये स्थिति हम तीनों की है।कालूराम और अनिल तो हमसे काफी आगे चल रहे हैं।यमुनोत्री मन्दिर लगभग आधे किलोमीटर रह गया है और राजेंद्र ने हाथ खड़े कर दिए हैं।

"अब इस तरह की चढ़ाई वाला कोई ट्रेक नहीं करेंगे।"

"ठीक है।"-मैंने अनुमोदन किया।

"मतलब,अब केदारनाथ नहीं जाएंगे।"-शायद चांदीराम यही सोच रहा है और उसका चेहरा उतर गया है।

लेकिन थोड़ी ही देर में वो सामान्य हो गया शायद अनिल की बात याद आ गयी।

वैसे इतनी चढाई करने के बाद राजेन्द्र की हवा पूरी तरह निकल चुकी है।चढाई तो मुश्किल है ही लेकिन उसके अलावा खच्चर वालों की वजह से भी तंग होना पड़ रहा है।वैसे खच्चर का प्रयोग उन्हें ही करना चाहिए जो ज्यादा बूढ़े हैं या शारीरिक रूप से अस्वस्थ हैं।लेकिन यहां तो अच्छे खासे मुस्टंडे भी खच्चर पर यात्रा कर रहे हैं।

खैर,किसी तरह यमुनोत्री धाम पहुंच ही गए ।


यमुनोत्री-उत्तराखण्ड के चार धामों में से पहला धाम।चारधाम यात्रा नियमों के अनुसार अगर कोई तीर्थयात्री चारधाम यात्रा करता है तो उसे सब से पहले यमुनोत्री धाम के दर्शन करने होते हैं।उसके बाद दूसरे स्थान पर आता है गंगोत्री धाम।उसके बाद बद्रीनाथ और सबसे अंत में पहुँचना होता है केदारनाथ धाम।यमुनोत्री से ऊपर यमुनोत्री ग्लेशियर से यमुना नदी का उद्गम होता है जो उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद में गंगा में मिल जाती है।यमुना का उद्गमस्थल होने के कारण यमुनोत्री का हिन्दू धर्म मे एक महत्वपूर्ण स्थान है।यहां गर्म पानी के स्त्रोत भी हैं।तीर्थयात्रियों के स्नान के लिए गर्म पानी के कुंड बनाए गए है।महिलाओं के स्नान के लिए अलग कुंड भी बनाया गया है।

यमुनोत्री पहुंचने के बाद सारी थकान मानो दूर हो गयी।यहां आने के बाद बहुत अच्छा लग रहा था।इस समय यहां ज्यादा भीड़ नही थी।मन्दिर में दर्शन करने से पहले गर्म पानी के कुंड में स्नान किया गया।स्नान करने के दौरान चांदीराम काफी उत्साहित था।लेकिन चांदीराम चाहता था कि उसका कच्छा ना भीगे।उसकी इस समस्या का समाधान अनिल ने कर दिया।अनिल ने कहा कि मैं अपना साफा बांध के नहाऊंगा।मेरे नहाने के बाद यही साफा बांध के तू नहा लेना।अनिल ने अपना साफा जिसका रंग सफेद था बांधा और कुंड में कूद गया।साथ ही मैं,राजेन्द्र और कालूराम भी उसी के साथ कुंड में कूद गए।चांदीराम इधर उधर घूमने लगा।सबसे पहले कुंड से बाहर मैं आया और कपड़े पहनने लगा।मेरे बाद अनिल का कुंड से बाहर आना हुआ।अनिल मेरे पास से गुजर कर अपने कपड़ों की तरफ चला गया।तभी मैंने महसूस किया कि मेरे पास खड़े लोग हंस रहे हैं।उनके हंसने का कारण मैं जल्द ही समझ गया।सफेद रंग का बारीक साफा गीला होने के कारण अब साफा होना और ना होना समान हो गया था।अनिल को छोड़कर सब को सब कुछ दिख रहा था।लेकिन अनिल का ध्यान साफे की ओर नही था।हंसी तो मुझे भी बहुत आयी लेकिन भाई की इज्जत सर्वोपरि है ये सोचकर मैं तुरन्त अनिल के पास गया और उसे वास्तविक स्थिति से अवगत करवा दिया।अनिल ने बिजली की गति से चुस्ती दिखाई और तुरन्त मेरा तोलिया साफे के ऊपर बांध लिया।इतने में कालूराम और राजेंद्र भी बाहर आ गए।और फिर आया चांदीराम जो इधर उधर घूम रहा था और आकर अनिल से उसका साफा मांगा।अनिल अब तक कपड़े पहन चुका था और बहुत ही संजीदगी और सलीके से अपना साफा चांदीराम को दे दिया।साथ ही हिदायत भी दे दी कि ज्यादा समय मत लगाना।चांदीराम भी ध्वनि की गति से कुंड में गया और प्रकाश की गति से स्नान करके बाहर आया।फिर क्या हुआ होगा इसकी कल्पना आप स्वयं कर लीजिए।

स्नान के बाद मंदिर में दर्शन किये गए।उसके बाद कुछ देर मन्दिर परिसर में फ़ोटो खींची गई।फोटोग्राफी के दौरान अहसास हुआ कि चांदीराम में एक मॉडल तो है।मन्दिर के पीछे जो रास्ता ग्लेशियर की तरफ जाता है वहां अच्छी खासी बर्फ जमी हुई थी।जहां तक नज़र जा रही थी सिर्फ बर्फ ही नज़र आ रही थी।बर्फ के नीचे से यमुना निकल रही थी।पानी कितना ठंडा होगा इसका अंदाजा अपने आप ही हो गया।वैसे यहां ठीक ठीक ठंड थी।

थोड़ा समय मन्दिर परिसर में गुजारने के बाद हम वापिस जानकीचट्टी के लिए चल पड़े।उम्मीद थी कि शायद बड़कोट का कोई साधन मिल जाए।वापसी में सिर्फ उतराई होने के कारण ज्यादा दिक्कत नहीं हुई।शायद एक घण्टा भी नहीं लगा और हम जानकीचट्टी में उस होटल पर थे जहां बैग रखी गयी थी।








कोई टिप्पणी नहीं: